गुरुवार, 12 मई 2016

स्वास्थ्य मंत्री की मीडिया को सलाह...


स्वास्थ्य मंत्री की मीडिया को सलाह...
यह तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना प्रदेश के स्वास्थ मंत्री अजय चंद्राकर मीडिया को सलाह देने की बजाय स्वयं के आचरण और करतूत को सुधारने में ध्यान लगाते।
दरअसल स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर इन दिनों अपनी करतूतों को लेकर मीडिया की सुर्खियों में हैं। प्रदेश सरकार के महत्वकांक्षी योजना ग्राम सुराज में हिस्सा ले रहे अजय चंद्राकर के रवैये को लेकर जिस तरह से बातें सामने आ रही है वह हैरान कर देने वाली है।धमकी-चमकी गाली गलौज के लिए पहले ही चर्चित अजय चंद्राकर के ग्राम सुराज में बोल इन दिनों चर्चा में है और अपने आचरण को ठीक करने की बजाय वे मीडिया को सलाह दे रहे हैं कि वे उन्हें निशाना बनाने की बजाय ग्राम सुराज जैसे अच्छे कार्य पर लिखे।
दरअसल पिछले दशक भर से चल रहे ग्राम सुराज को लेकर सरकार की पहले ही किरकिरी हो रही है ऐसे में अजय चंद्राकर के आचरण की चर्चा स्वाभाविक है। ऐसा नहीं है कि अधिकारियों की करतूतों की वजह से अजय चंद्राकर का गुस्सा फुट रहा है असल में अजय चंद्राकर अपनी इस तरह की हरकतों को लेकर पहले ही चर्चा में रहे हैं। महिलाओं से दुव्र्यवहार के अलावा दूसरे कई मामले पहले भी उठते रहे हैं। जानकारों का तो यहां तक दावा है कि अपनी इसी हरकत की वजह से ही वे पिछली बार चुनाव में पराजित हुए थे।
वैसे मीडिया को लेकर जिस तरह की सोच बनते जा रही है उसे लेकर मीडिया को भी सचेत रहने की जरूरत है। बस्तर के पत्रकारों पर जिस तरह से नक्सली और पुलिस का दबाव है लगभग खबरें न छापने को लेकर राजधानी के पत्रकारों पर मैनेजमेंट का दबाव कम नहीं है। किस मंत्री से किस अखबार मालिक का संबंधहै किसी से छिपा नहीं है। राजधानी में विज्ञापनों का दबाव के चलते खबरों का रुकना आम बात होने लगी है और इस वजह से सोशल मीडिया में भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का न केवल मजाक उड़ाया जाने लगा है बल्कि मीडिया की छवि को नुकसान पहुंचा है।
हालांकि यह बात बहुत कम लोग जानते है कि यह सारा खेल अखबार मालिक और सरकार के बीच का खेल है जिसमें पत्रकारों का कोई खास लेना देना नहीं होता। परन्तु जिस तरह से मीडिया को गरियाने या समझाने की परम्परा शुरु हुई है इसका क्या असर होगा यह भविष्य के गर्भ में है।
और अंत में...
मीडिया से खासे नाराज रहने वाले सत्ता पक्ष के एक नेता का कहना है कि दरअसल राजधानी के मीडिया घरानों का कांग्रेसियों से संबंध प्रगाढञ रहे हैं और वे यदि पावर में आये तो कईयों की दुकानदारी बंद करा देंगे और इस अभियान के तहत वे इन दिनों विकास प्राधिकरण में कमीशनखोरी का धन जमा करने में मशगूल है।

मंगलवार, 15 मार्च 2016

लिखने की दो... आजादी!


जेएनयू में कन्हैया कुमार जब लाल सलाम का मतलब समझा रहा था तब दिल्ली से दूर बैठे छत्तीसगढ़ में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यहां सिर्फ लाल सलाम कहने वाले जेल में क्यों और कैसे ठूंस दिये जाते है। दिल्ली में लाल सलाम पर कानून का नजरिया अलग और छत्तीसगढ़ में अलग क्यों है। क्या इस देश में दो तरह के कानून है।
सवाल तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस वक्तव्य को लेकर भी उठ रहे है कि कल तक भारत में पैदा होने में शर्म महसूस होता था। कोई और ऐसा कह दे तो चड्डी वाले उसका जुलूस ही नहीं निकालते पुलिस भी मार कूट कर उसे सलाखों के पीछे डाल देती।
सवाल अभिव्यक्ति की आजादी और उसके खतरे का बना हुआ है। सरकार किसी की भी हो अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे सामान रुप से बना हुआ है। पत्रकारिता से इन बातों का सीधा संबंध हम देखते हैं कि कैसे दिल्ली से दूर गांव तक आते-आते पत्रकारिता पर दबाव बढ़ता जाता है।
राजधानी में यह खतरे दूसरी तरह का है। यहां पत्रकारों को कोई सीधा पकड़कर जेल में नहीं डालता परन्तु उसकी नौकरी छुड़ा दी जाती है। इस खेल में पुलिस का नहीं जनसंपर्क विभाग का सहारा लिया जाता है। ऐसे कितने ही उदाहरण है जब सिर्फ एक खबर पर कितनों की नौकरी चली गई कितनों के तबादले कर दिये गये। एक अखबार सारा संसार की बात हो या पत्र नहीं मित्र की बात हो राजस्थान से आये धुरंधर की बात हो या मंझोले कद की बात हो। खबरों की सच्चाई पर कम जनसंपर्क के दबाव में लिखने की आजादी पर बंदिशें लगाई गई।
कन्हैया के लाल सलाम का जिक्र यहां इसलिए किया जा रहा है कि बस्तर में पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने जैसी है। नक्सली की आड़ में भ्रष्टाचार खूब फल फूल रहा है। सड़क-भवन के नाम पर आने वाले करोड़ों रुपये भ्रष्टाचार की भेट चढ़ रहा है। नक्सलियों का डर बताकर सरकारी सेवक कार्यालयों से गायब हो जाते हैं। महिनों स्कूल नहीं लगता पर वेतन बराबर बंटता है। राजीव गांधी शिक्षा मिशन का बुरा हाल है। पीडब्ल्यूडी के भवन व सड़क निर्माण का कोई हिसाब नहीं है। मनरेगा से लेकर दूसरी सरकारी योजनाएं दम तोड़ रही है और इस पर लिखने वालों को सीधे धमकी ही नहीं दी जाती जेल तक में ठूंस दिया जाता है। आरोप भी नक्सलियों से सांठ-गांठ का होता है। 
दिल्ली में जिस मस्ती से कन्हैया ने लाल सलाम कह दिया वैसा बस्तर में कोई कह नहीं सकता। जन सुरक्षा कानून मजबूती से पैर जमाये हुए है। बीबीसी के पत्रकार आलोक पुतुल को भेजे जाने वाले मैसेज क्या यह चुगली करने के लिए काफी   नहीं है कि यहां सब कुछ ठीक नहीं है। परन्तु सरकार को यह सब नहीं दिखता। पर्याप्त सबूत के बाद भी सरकार की खामोशी क्या यह साबित नहीं करते कि बस्तर में पत्रकारों के साथ जो कुछ हो रहा है वह सब सरकार के इशारे पर हो रहा है?
यह सच है कि इन दिनों देश भर में पत्रकारों को गरियाने का दौर चल रहा है। परन्तु इसके लिए जिम्मेदार क्या सरकार-प्रशासन और वे मीडिया हाउस नहीं है जो दबाव में है। जो अपने हितों के लिए पत्रकारों को शार्प शूटर की तरह इस्तेमाल करते हैं और जब उन्हें खबरों पर स्वयं के हित में खतरे दिखते हैं पीछे हट जाते हैं।
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गुरुवार, 3 मार्च 2016

एक बहस पत्रकारिता पर...


अब इस पत्रकारिता का क्या करोगे? जिसे देखो वही गरियाने लगा है। लोगों की उम्मीद बढ़ी है। इस उम्मीद में खरा उतरना मुश्किल होता जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे पहले भी कम नहीं थे परन्तु सरकार का पहले इतना दबाव नहीं होता था। तब अखबार का मतलब एक मिशन होता थआ। परन्तु समय बदला। सरकार और कार्पोरेट सेक्टर ने विज्ञापन का ऐसा दबाव बनाया कि इसके झांसे में सभी आ गये। सिर्फ यही नहीं तय होने लगा कि खबरे कौन सी छपनी है बल्कि यह भी तय होने लगा कि खबरें कैसे बनाई जाए। खबरों का इस्तेमाल शार्प शूटर की तरह होने लगा।
बड़े कार्पोरेट सेक्टर के लिए मीडिया मुनाफा कमाने का व्यवसाय बन गया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद जिस तरह की क्रांति आई उससे पत्रकारिता के मूल उद्देश्य ही बिखर कर रह गया। जो दिखता है वह बिकता है का खेल शुरु हुआ और यह उस स्तर तक जा पहुंचा जहां अवसाद के अलाला कुछ नहीं बचा। अपने नंगे पन पर गर्व करते मीडिया पर लोगों का कितना गुस्सा है यह कहीं भी महसूस किया जा सकता है।
कौन पत्रकार नाम कमाना नहीं चाहता और कौन मेहनत करना नहीं चाहता। सारे पत्रकार सहज भाव से अव्यवस्था के खिलाफ कलम चलाना चाहते हैं। हर अव्यवस्था पर शब्दों के प्रहार से वह सिर्फ हंगामा ही नहीं खड़ा करना चाहता बल्कि अव्यवस्था को मिटा देना चाहता है। परन्तु सबको मनचाही स्थिइत नहीं मिलती। कुछ पत्रकार जरुर क्यारी में लगे गुलाब की तरह अपनी सुंगध बिखरने में सफल हो जाते हैं परन्तु यह सब इतना आसान नहीं होता। कोई आंख तरेर खड़ा होता है। कोई नोटों की गड्डियां लिये खड़ा होता है और अब तो सरकारी पदों में बैठे लोगों में भी संयम नहीं रहा। सीधे जेल भिजवाने की धमकी तो किसी के मुंह से सीधी सुनी जा सकती है और फिर अखबार खोलने वाले भी तो दुकानदार हो गये हैं। लाखों करोड़ों की मशीन लगाकर कोई सरकार से पंगा क्यों ले? अखबार की आड़ में माफियागिरी भी करनी है। चिटफंड कंपनी चलानी है, जमीन लेनी है कोल ब्लॉक से लेकर सरकारी ठेका भी तो लेना दिलाना है।
पत्रकारिता के प्रति आम लोगों का गुस्सा यूं ही नहीं बढ़ा है। इसके पीछे दुकानदारी की वह सोच है जो सरकार के भ्रष्ट तंत्र के साथ खुद वैतरणी पार लगाकर सात पुश्तों की की व्यवस्था कर लेना चाहता है। वह दिन लद गये जब पत्रकार मरियल सा पायजामा कुर्ता या खद्दर पहने समाज सेवा के लिए जाना जाता था। मोहल्ले से लेकर शहर में उसकी इज्जत होती थी। हर पीडि़त पक्ष बेधड़क अपनी व्यथा कह देता था। अच्छे-अच्छे पुलिस के अधिकारी भी पत्रकारों के सामने आने से कतराते थे। परन्तु जमाना बदल गया है। तेजी से बदला है अब कलम की विवशता आंखों में साफ पढ़ी जा सकती है यह अलग  बात है कि अब इन पानीदार आंखों को देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है वह तो बस पत्रकारिता में आये इस बीमारी को ही देखकर अपनी भड़ास निकालने में सुकून महसूस करता है।
पत्रकारिता का एक और मिजाज है। वह कभी कभी उत्साही हो जाता है और जिसकी परिणिति बस्तर जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति से साफ समझा जा सकता है जहां सरकारी पदों पर बैठे लोगों के पास जनविरोधी कानून जैसे हथियार के अलावा कुचलने या जेल में भेजने के सारे सामान होते हैं। राजधानी तक उनकी आवाज कैसे पहुंचे। यह भी प्रश्न खड़ा है। प्रश्न तो राजधानी के पत्रकारों और पत्रकारिता पर भी उठने लगे है परन्तु वे सौभाग्यशाली होते है कि उनके पास बंधी बंधाई तनख्वाह है।
परन्तु अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरों के बाद भी सरकारी तंत्र और माफियाओं के गठजोड़ से मचे लूट के बाद भी क्यारियों के गुलाब की तरह पत्रकारिता का सुंगध कायम है पीडि़तों के लिए न्याय का दरवाजा खोलता है और अव्यवस्था के खिलाफ हंगामा खड़ा करता है। भले ही क्या करोगे ऐसा पत्रकारिता के शब्द ताकतवर दिखाई पड़ रहे हो परन्तु वह ताकतवर कतई नहीं है। पत्रकारिता आज भी खामोश नहीं है उसके कलम में धार कायम है स्याही जरुर फीकी हो गई है परन्तु अभी इतनी फीकी नहीं हुई है कि इसे पढ़ा न जाए। स्याही गाढ़ी जरुर होगी। समय लगेगा।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

शादी समारोह और पत्रकार


छत्तीसगढ़ पिछले हफ्ते वी आई पी शादियों के लिए चर्चा में रहा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोती लाल वोरा और प्रदेश सरकार के मंत्री द्धय बृजमोहन अग्रवाल ओर अमर अग्रवाल के यहां शादियां थी। इस शादी में बंटे निमंत्रण पत्र ओर इसमें आने वाले मेहमानों की चर्चा रही लेकिन इस समारोह में शामिल होने वाले पत्रकारों की चर्चा भी मीडिया जगत में होने लगी है।
तीनों ही शादियों के निमंत्रण पत्र पत्रकारों के रूतबे के हिसाब से बांटा गया। बैनर को प्राथमिकता तो दी ही गई। विवाह समारोह में शामिल होने गाडिय़ों के भी प्रबंध किये गये। शादी समारोह में शामिल होने वाले फोटोग्राफरों ने तस्वीरें भी खूब ली लेकिन उस तरह से नहीं छपा। सबसे बड़ी शदी का तमगा बृजमोहन अग्रवाल ले गये। अन्य समारोह से ज्यादा वीआईपी और भीड़ भी मोहन भैया ने ही खीची लेकिन पत्रकारों को आने वाले वीआई पी अतिथि से बातचीत करने का मौका नहीं मिला। कुछ पत्रकार इस कोशिश में लगे भी रहे लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ। हां वीआईपी लोगों के खुशामत करते स्थानीय नेताओं की तस्वीरें भी कैद करने में फोटो ग्रफर सफल हो गये लेकिन किसी की यह सब छप नहीं पाया।
नवभारत में फिर 
तनाव शुरू...
नवभारत में रंगा-बिल्ला की जोड़ी अपनी हरकतों से बाज ही नहीं आ रहे हैं जिसके चलते एक बार फिर कर्मचारियों में आक्रोश पनपने लगा है और वे इस बार आर पार की लड़ाई करने के मूड में है तो क्रानिकल वाले इसका इंतजार कर रहे हैं।
वेतन को लेकर 
माथापच्ची...
पत्र नहीं मित्र बताने वाले एक अखबार में वेतन को लेकर फिर संकट शुरू हो गया है। यहां के कर्मचारी टाईम पर वेतन नहीं मिलने का रोना तो रो रहे हैं लेकिन सामने आकर कुछ करने की हिम्मत नहीं है। फिर मालिकों के दलालों की भी कमी नहीं हैं इसलिए अपनी व्यथा दबी जुबान पर कर रहे हैं।
पिकनिक और मजा 
हर साल की तरह इस बार भी प्रेस क्लब परिवार 26 जनवरी को मनोंरजन भ्रमण पर निकले थे। रतनपुर महामाया के दर्शन से अभिभूत पत्रकार जब कानन पेंडारी पहुंचे तो सोमवार होने की वजह से ताला लगा था। वहीं कुछ देर बिताने के बाद कई नाराज लोग होटल पहुंचे तो रात के खाने की व्यवस्था से कानन पेड़ारी नहीं घूम पाने का दर्द भूल गये। हर बार की तरह इस बार भी पत्रकार परिवारों ने खूब मजा किया।
दबंग की दंबगई 
राजधानी से प्रकाशित होने वाले एक अखबार ने एक ही बार में कई पत्रकारों को चलता कर दिया। अचानक नौकरी जाने की मुसिबत से पत्रकार दुखी हैं और वे इसकी शिकायत भी कर रहे है लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है।
पहल एक नई सोच
 पत्रिका का विमोचन
रायपुर। डी.एड. प्रशिक्षण केन्द्र पिथौरा के दूरस्थ प्रशिक्षण डी.एड.के प्रशिक्षार्थियोँ द्वारा पहल एक नई सोच नामक पत्रिका का विमोचन प्रशिक्षण केन्द्र शा.उच्च. मा. वि. पिथौरा मेँ किया गया। जिसके मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार पटनायक, विशिष्ट अतिथि पी.एस. श्याम प्राचार्य डाइट महासमुन्द, एम.डी. प्रधान सेवानिवचत प्राचार्य, एम.के. दास प्राचार्य प्रशिक्षण केन्द्र पिथौरा ने सभा को संबोधित किया। केन्द्र समन्वयक शंकर गोयल ने इसे एक अभिनव पहल बताया वहीं संपादक इंदीवर वैष्णव ने पत्रिका पर प्रकाश डाला। सहसंपादक सुन्दर लाल डडसेना ने पत्रिका को एक नई सोच को संज्ञा के अनुरुप बताया तथा नीरज दास ने आभार प्रकट किया। पत्रिका को प्रकाशित करने मेँ सभी प्रशिक्षार्थियों का प्रत्यक्ष एवं परोख सहयोग रहा।
और अंत में...
प्रेस क्लब का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहा है कई पदाधिकारियों की धड़कने तेज होने लगी है। व्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं होने से कई नारा जो हैं। 

सोमवार, 24 मार्च 2014

मीडिया को गरियाने का मतलब...


इन दिनों कार्पोरेट मीडिया घराना आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल और उसकी टीम के निशाने पर है। लोकपाल बिल को लेकर राजनीति में आने वाले अरविन्द केजरीवाल का यह हमला कितना कारगर और सही है यह विवाद का विषय है। विवाद का विषय तो कार्पोरेट मीडिया घराना के कारनामों भी है। कार्पोरेट मीडिया घराना की विश्वसनियता पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं। खासकर चुनावों में पेड न्यूज को लेकर इन पर हमला पहले भी होता रहा है। सुखद स्थिति यह है कि छत्तीसगढ़ में यह स्थिति पूरी तरह हावी नहीं है। खबरों को लेकर आम लोगों की नाराजगी जरूर है। बड़े लोगों के खिलाफ खबरे ठीक से प्रकाशित नहीं करने का आरोप भी लगता रहा है लेकिन पत्रकारिता के मल्यों को लेकर सवाल कम ही है। छत्तीसगढ़ में अखबार की आड़ में जमीन लेने और सरकारी सुविधाओं के इस्तेमाल को लेकर सवाल तो उठते हैं लेकिन इससे परे जाकर पत्रकारिता के मूल्यों की चिंता करने वालों की भी कमी नहीं है। इलेक्ट्रानिक मीडिया पर आज भी प्रिंट मीडिया हावी है और इलेक्ट्रानिक मीडिया भी उस स्थिति में नहीं पहुंच सका है कि कोसा जा सके। नवभारत की विश्वसनियता आज भी कायम है तो भास्कर के मार्केटिंग का कोई जवाब नहीं है पत्रिका का तेवर बरकरार है तो दूसरे अखबार भी खबरों को लेकर चर्चा में बने रहने को जुगत में लगे हैं। यह अलग बात है कि आज भी भंडाफोड़ खबरों के लिए छोटे अखबार ही माहिर है। संपादकीय टीम पर भले ही विज्ञापन या मार्केटिंग वाले हावी हो लेकिन पत्रकारिता के मूल्यों पर समझौते की स्थिति कम ही है। यह अलग बात है कि अखबारों के द्वारा सरकारी जमीन लेने और अधिमान्यता लेने  में अखबार मालिकों में होड़ मची है लेकिन यहां के ज्यादातार पत्रकारों को अब भी सरकारी सुविधा लेने में परहेज है। अरविन्द केजरीवाल के मीडिया पर लगाये आरोप को लेकर छत्तीसगढ़ में भी हलचल कम नहीं है। और इस पर दोनों तरह की राय स्पष्ट दिखने लगी है। एक वर्ग इसे अखबार को धंधा बनाने वालों पर हमला के रूप में देखता है तो दूसरा वर्ग इससे पत्रकारिता के और मजबूत होने की उम्मीद के रूप में देखता है। ऐसा नहीं है कि मीडिया पर आरोप पहली बार लगा है पहले भी इस तरह के सवाल उठते रहे हैं।
प्रेस क्लब में होली
प्रेस क्लब में होली का कार्यक्रम इस बार अलग ही ढंग का रहा। होलिका दहन के दिन आयोजित होने वाले कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया लेकिन दूसरे दिन यानी रंग खेलने सभी पहुंचे। कुछ लोग दस साल बोतल नहीं मिल पाने का टोना रो रहे थे लेकिन यह कसर भी दूर हो गई ज्यादातर वही लोग आये जो रोज आते हैं।
नानसेंस टाईम्स की खाना पूर्ति
हर साल अपना जलवा दिखाने वाला नानलेंस टाईम्स इस बार खाना पूर्ति करता नजर आया। तपेश जैन, मधुसूदन शर्मा की यह शुरूआत इस बार फीका रहा। खबरों से ज्यादा विज्ञापन हावी रहा तो कई लोग जान बुझकर छोड़ दिये गये।
और अंत में...
प्रेस क्लब के चुनाव में इस बार एक अखबार मालिक की रूचि को लेकर चर्चा गर्म है इस बार प्रेस क्लब में वे अपने रिपोर्टरो को प्रमुख पदों पर बिठाने लालायित है और इसकी रणनीति तैयार की जाती है। पहली बैठक हो चुकी है।

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

पद की बढ़ती लालसा...


ऐसा नहीं है कि  राजनीति में ही पद के लिए सब कुछ होता है। राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में भी पद के लिए कुछ भी करेगा वालों की कमी नहीं है।
छत्तीसगढ़ में पत्रकार के संगठनों की कमी नहीं है और कई लोग तो इसे दुकानदारी तक बना चुके है लेकिन रायपुर प्रेस क्लब अब भी सबसे प्रतिष्ठित है। लेकिन हाल के सालों में इस पर भी पद लोभ का जो रंग चढ़ा है वह आश्चर्यकर देने वाला है। कभी हाथ उठाकर पदाधिकारी बनाने वाला यह क्लब चुनाव के झंझटो में पड़ गया है तो इसकी वजह पद की आड़ में अपना उल्लू सीधा करना नहीं तो और क्या है।
पिछले डेढ़ दो दशकों से तो ज्यादातर यह हुआ है कि जिसने भी पद पाई वह चुनाव को टालने की कोशिश में रह गया। और नियत समय में चुनाव नहीं कराने की वजह से हंगामा की स्थिति बनी। इसकी एक प्रमुख वजह वरिष्ठ पत्रकारों की प्रेस क्लब से दूरी बना लेना भी है। तो कुछ लोगों की गुटबाजी भी है।
इस बार भी नियत समय में चुनाव नहीं होने पर जब सदस्यों ने दबाव बनाया तो चुनाव की तिथि घोषित कर दी गई।
प्रेस क्लब का चुनाव 30 मार्च को है और अगला चुनाव सही समय पर हो इसे लेकर भी चिंता है। सबसे बड़ी चिंता उन्हें है जो हर हाल में पद चाहते हैं इसके लिए घेरेबंदी भी शुरू हो गई है।
हालांकि कई लोगों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन कहा जा रहा है कि पहले पदों पर रहे लोग इस बार फिर से सक्रिय हो गये हैं। इनकी सक्रियता की वजह पुन: पद पर आना है।
हालांकि पिछला अनुभव स्पष्ट हैं कि जिसने भी दोबारा पद पाया है उसने नियम समय में चुनाव नहीं कराया है इसके बाद भी अच्छे पत्रकारों की प्रेस क्लब से दूरी की वजह से वह सब होने लगा है जो नहीं होना चाहिए।
राजधानी बनने के बाद बढ़ी प्रतिस्पर्धा से कई पत्रकारों को किसी तरह नौकरी बचा लेने की चिंता है तो कोई विवाद से दूर रहना चाहता है यही वजह है कि ऐसे लोग सक्रिय हो जाते हैं। जो पत्रकारिता की बजाय पद से अपनी छवि बनाना चाहते है।
प्रेस क्लब में मोटे तौर पर 40-50 पत्रकार ही नियमित रूप से आते हैं इनमें से ज्यादातर प्रेस कांफ्रेंस के दिनों में ही दिखते है बाकी फोटोग्राफरों का समूह होता है जिन्हें अपने काम से मतलब होता है। एक समूह सिर्फ समय काटने पहुंचता है तो कुछ यहा कदा खबरों के फेर में आते हैं। ऐसे में करीब चार सौ सदस्यों वाले एस प्रेस क्लब की चिंता को लेकर कुछ लोग ही दुबले हो रहे है। तो इसकी परवाह भला कौन करे।
वरिष्ठ व सम्मानित पत्रकारों की आवाजाही नहीं के बराबर है वे आते भी है तो तभी जब कोई आयोजन हो। ऐसे में स्वेच्छाचारिता तो बढ़ी ही है पठन-पाठन में भी रूझान कम हुआ है। आजकल तो खबरों पर कम दूसरी बातों पर ही चर्चा अधिक होती है।
और अंत में...
प्रेस क्लब की सदस्यता को लेकर विवाद गहराता रहा है। काफी अरसे से नये सदस्य नहीं बनाये जा रहे हैं और इस बार भी चुनाव पुराने सदस्यों के हिसाब से ही होना है ऐसे में नये सदस्यों का क्या होगा। अब तक तो वे बेरोक टोक प्रेस क्लब आ ही रहे हैं।

सोमवार, 3 मार्च 2014

ये तो होना ही था...

प्रेस क्लब में अंतत: चुनाव की तिथि घोषित हो ही गई। 30 मार्च को होने वाले चुनाव के लिए सदस्य 8 माह से लगे हुए थे लेकिन पदाधिकारियों को बहाने बाजी के चलते चुनाव टलता ही जा रहा था इधर पदाधिकारियों से नाराज सदस्यों ने दबाव बनाया तो एक-एक कर पदाधिकारी इस्तीफा देने लगे और जब सदस्यों ने 2 मार्च को आामसभा बुलाने का आग्रह नोटिस बोर्ड में चिपका दिया तो फिर पदाधिकारियों को मजबूरन बैठक बुलानी पड़ी। बैठक में हंगामे के पूरे असार थे लेकिन जब बैठक शुरु हुई तो कॉकस ने मोर्चा संभाल लिया। पिछली बार भी यही हुआ था अनिल पुसदकर के पांच साल के कार्यकाल को  माफी दे दी गई और इस बार भी वहीं हुआ और तय हुआ कि एक समिति बना दी जाए जो 30 मार्च को चुनाव करा देगी। सदस्यों का गुस्सा हटा या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन सारा कुछ पूर्ण निर्धारित तरीके से सम्पन्न हो गया। अब देखना है कि 30 की सामान्य सभा में क्या होता है।
बड़े से टकराओंगे
चूर-चूर हो जाओगे।

पूरे देश को अपना बंधु मानने वाले अखबर के पत्रकार को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि बटाविया जैसे दिग्गज धंधेबाज से टकराना इस कदर भारी पड़ेगा कि उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। आखिर बटाविया छोटा मोटा खिलाड़ी तो है नहीं उसकी गिनती नौ रत्नों में होती है।
अब यह पत्रकार जगह-जगह अपनी पीड़ा बताते घुम रहा है। प्रेस क्लब ने भी इसे पत्रकार के घर जबरिया पुलिस घुसने की निंदा जाहिर की थी। पदाधिकारियों को भी खामोश रहने का संकेत दिया गया। ऐसा पहले भी हो चुका है आजकल विज्ञापन के दबाव में अखबार मालिक पत्रकारिता के मूल्यों को ताक पर रखते हैं। इससे पहले जनसंपर्क के खिलाफ खबर छापने पर एक पत्रकार की नौकरी जा चुकी है।
जितना बड़ा बैनर
उतना बड़ा पैकेज

लोकसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है। राजनैतिक दल अपने हर गतिविधियों का प्रमोशन चाहते है और इसके लिए नामचीन अखबारों के पत्रकारों को खबर के साथ बहुत कुछ देने लगे हैं। खबर है कि पिछले दिनों ऐसे ही लेन देन को लेकर संझट हो गया उसे ज्यादा मुझे कम को लेकर मुंह  फुलने फुलाने का कवायद चल रही है। ऐसा ही नजारा विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला था जब एक बड़े बैनर को पता चला था कि उसे कम पैकेज दिया गया। खबरें उल्टी लगने लगी और फिर बाद में मामला सेट किया है।
छोटे बैनर वाले तब भी हताश व निराश थे लेकिन इस बार कुछ छोटे बैनर वाले बैठक कर चुके हैं कि किस तरह से दबाव बनाया जाए। शहर के मध्य स्थित एक होटल में रात के डिनर के साथ हुई बैठक तो जोरदार रही लेकिन दबाव कितना जोरदार होगा कहना कठिन है।
और अंत में...
30 मार्च को होने वाले प्रेस क्लब के चुनाव को लेकर इस बार जबरदस्त मोर्चेबंदी होने लगी है। कुछ पुराने पदाधिकारी भी चुनाव लडऩा चाहते है लेकिन पिछले दो कार्यकाल को लेकर जो बदनामी हुई है उसकी वजह से हार का डर साफ दिखने लगा है। कई तो अभी से कहने लगे है कि मुझे दुबारा नहीं लडऩा तो कुछ कह रहे हंैं इस बार नहीं लडऩा।